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आज मेरा सौभाग्य है कि मैं तरावड़ी में हूँ। यह अद्भुत और ऐतिहासिक कस्बा है। अभी मैं देख रहा था कि यहाँ की धरती में कार्बन की मात्रा बहुत अधिक है। इसका मतलब है कि धरती का स्वास्थ्य अच्छा है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आप पराली का प्रबंधन कर रहे हैं और दूसरे उपाय भी अपना रहे हैं।
मेरी बहनों और भाइयों, जीने के लिए हमें अन्न, हवा और पानी चाहिए। अन्न ही ब्रह्म है। गेहूँ और चावल तो चाहिए ही, लेकिन हमें फल भी चाहिए, सब्जियाँ भी चाहिए और पशुओं के लिए चारा भी चाहिए। इनके बिना जीवन नहीं चल सकता।
इसलिए, जब से यह सृष्टि बनी है, मनुष्य ने खेती करना प्रारंभ किया। भारत में तो बहुत प्राचीन काल से खेती होती आ रही है।
एक समय था, जब प्राकृतिक खेती होती थी और फसल पैदा करने के लिए हम कोई खाद नहीं डालते थे। धीरे-धीरे खाद का प्रचलन बढ़ा और आज स्थिति यह हो गई है कि जब मैंने किसानों से पूछा कि कितना खाद डालते हो, तो उन्होंने बताया कि एक एकड़ में चार कट्टे खाद डालते हैं। यह मात्रा हर साल बढ़ती जा रही है।
मैं केवल यहाँ के किसानों से बात नहीं कर रहा हूँ। देशभर में एक हजार स्थानों पर किसान जुड़े हुए हैं। मैं सभी किसान भाइयों से कह रहा हूँ कि जरा विचार करें कि हमारे खेतों की हालत क्या होती जा रही है।
एक भ्रम है कि जितना ज्यादा खाद डालेंगे, उतनी ज्यादा फसल पैदा होगी। यह भ्रम है। अभी राणा जी ने बहुत अच्छी बात कही कि मिट्टी की जाँच करके देखना चाहिए कि उसमें किन तत्वों की कमी है। जो तत्व पहले से मिट्टी में मौजूद है, उसी को फिर से डालने से क्या फायदा होगा? मैं किसानों से पूछता हूँ—क्या इससे कोई फायदा होगा?
बिना जरूरत खाद डालते जाइए, तो पैसा भी ज्यादा खर्च होगा। जब किसी चीज की जरूरत ही नहीं है और आप उसे फिर भी डालते हैं, तो फायदा होगा या नुकसान?
मुझे कोई बीमारी नहीं है, लेकिन आप मुझे उस बीमारी की दवा खिला दें, तो क्या मैं बीमार नहीं हो जाऊँगा? इसलिए यह देखना जरूरी है कि खेत को किस चीज की जरूरत है।
यह जरूरी नहीं है कि श्याम सिंह राणा जी खाद डाल रहे हैं, तो राम सिंह राणा भी डालें। हालाँकि श्याम सिंह राणा जी तो प्राकृतिक खेती कर रहे हैं। वे बीजामृत और जीवामृत जैसी विधियों से खेती कर रहे हैं।
अत्यधिक खाद के इस्तेमाल से हमारी धरती माता की तबीयत खराब हो रही है। जैसे इंसान की तबीयत खराब होती है, वैसे ही मिट्टी की तबीयत भी खराब होती है। मिट्टी में करोड़ों-अरबों जीव रहते हैं।
खाद और कीटनाशकों के अत्यधिक इस्तेमाल से ये जीव मरते जा रहे हैं। मित्र कीट भी कीटनाशकों और अधिक रासायनिक खाद के कारण नष्ट हो रहे हैं। इससे धरती की उर्वरता प्रभावित हो रही है।
याद रखना, मेरे देशवासियों! अगर खाद का अनियंत्रित और असंतुलित इस्तेमाल इसी तरह होता रहा, तो एक दिन धरती फसल पैदा करने से भी इनकार कर सकती है।
जरा बताइए, क्या हमारे बाद इस धरती पर इंसान नहीं रहेंगे? हमारे बाद हमारे बच्चे होंगे, फिर उनके बच्चे होंगे। क्या उन बच्चों के प्रति हमारा कोई कर्तव्य नहीं है? क्या हम उनके लिए ऐसी धरती छोड़कर जाएँगे, जो फसल ही पैदा न कर सके?
इसलिए आइए, सब मिलकर विचार करें। मैं यह नहीं कह रहा कि खाद बिल्कुल मत डालिए। मैं आपको मना करने नहीं आया हूँ। खाद डालिए, लेकिन उतनी ही डालिए, जितनी जरूरत है।
आपके खेत में किन तत्वों की कमी है, यह जानने के लिए अपने सॉइल हेल्थ कार्ड की जाँच कीजिए। मोबाइल पर उपलब्ध जानकारी से भी सहायता लीजिए। खेत को जिन तत्वों की जरूरत है, उसी के अनुसार खाद का संतुलित उपयोग कीजिए। इसका अत्यधिक इस्तेमाल मत कीजिए। कीटनाशकों का भी संतुलित उपयोग कीजिए।
आज मैं आपसे कुछ और निवेदन करने आया हूँ। मेरी बहनों और भाइयों, मिट्टी को बचाने के कई उपाय किए जा सकते हैं।
पहला उपाय है: खाद का संतुलित उपयोग।
दूसरा उपाय है: फसल चक्र में बदलाव।
मैं भी किसान हूँ। केवल उपदेश देने के लिए ये बातें नहीं कह रहा हूँ। अगर एक साल गेहूँ बोते हैं, तो अगले साल दूसरी फसल लगाने की कोशिश कीजिए। हमारे बुजुर्ग भी ऐसा ही करते थे। ऐसा नहीं होना चाहिए कि हर साल धान और गेहूँ, धान और गेहूँ ही उगाते रहें।
एक साल गेहूँ बोइए, तो दूसरे साल चना, मसूर या दूसरी दलहनी फसल लगाने की कोशिश कीजिए। हरियाणा में आज दलहनी फसलों की खेती कम होती जा रही है।
जब आप चना या मसूर जैसी दलहनी फसलें लगाते हैं, तो उनसे मिट्टी में नाइट्रोजन स्थिरीकरण में मदद मिलती है। इससे मिट्टी को आवश्यक पोषक तत्व मिलते हैं।
इसलिए मेरा दूसरा निवेदन है कि एक ही फसल बार-बार न लगाएँ। फसल बदलने की कोशिश करें और उचित फसल चक्र अपनाएँ।
तीसरा निवेदन है—प्राकृतिक और जैविक खेती को बढ़ावा दें।
आज मैं यह कहने नहीं आया हूँ कि आप पूरी जमीन पर प्राकृतिक खेती ही करें। अगर आपके पास पाँच एकड़ जमीन है, तो आधा एकड़ जमीन पर प्राकृतिक खेती करके देखिए।
श्याम सिंह राणा जी प्राकृतिक खेती के बारे में बता रहे थे। बीजामृत और जीवामृत जैसी विधियाँ इसमें उपयोगी हैं।
गाय के गोबर में अनेक सूक्ष्मजीव होते हैं। निर्धारित विधि से गोबर, मिट्टी और अन्य आवश्यक सामग्री का उपयोग करके जीवामृत तैयार किया जा सकता है। इससे प्राकृतिक खेती के लिए आधार तैयार होता है।
मैं कहता हूँ कि पूरे खेत में एक साथ बदलाव मत कीजिए। पहले आधा एकड़ में करके देखिए। कम-से-कम अपने घर में खाने के लिए प्राकृतिक तरीके से अनाज और दूसरी उपज पैदा करके देखिए।
इसके बाद आप स्वयं अनुभव करेंगे कि मिट्टी का स्वास्थ्य कैसे सुधरता है। अगर प्राकृतिक खेती सही तरीके से की जाए, तो दो-तीन या चार साल में उत्पादन भी बेहतर हो सकता है और खेती की लागत भी कम हो सकती है। जब लागत कम हो और उत्पादन अच्छा हो, तो किसान को फायदा होगा या नुकसान?
मेरे बहनों और भाइयों, इसलिए धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती की ओर भी बढ़िए।
एक और बात कहना चाहता हूँ। अभी हमने खेत में जाकर देखा कि पराली में आग लगाना कितना नुकसानदायक है। इससे खेतों में रहने वाले अनेक जीव-जंतु और उपयोगी कीट मर जाते हैं।
आप कल्पना करके देखिए कि पराली में आग लगने पर कितने जीव-जंतु इधर-उधर भागते हैं। धरती में रहने वाले अनेक जीव भी आग की चपेट में आ जाते हैं। आग लगाने से पराली के साथ-साथ जमीन की ऊपरी सतह पर रहने वाले जीव भी नष्ट हो जाते हैं।
यही जीव धरती की उर्वरता बढ़ाने में मदद करते हैं। आपने देखा होगा कि पहले बारिश के दिनों में केंचुए बहुत दिखाई देते थे। बचपन में हम उन्हें घरों और आसपास की जगहों पर भी देखते थे। आज कई जगह वे कम दिखाई देते हैं।
केंचुआ धरती का सबसे बड़ा डॉक्टर है। वह जमीन के भीतर जाकर मिट्टी को भुरभुरा बनाता है। इससे मिट्टी में हवा का संचार होता है और उसकी उर्वरता बनाए रखने में मदद मिलती है। जब हम पराली जलाते हैं, तो ऐसे उपयोगी जीव भी नष्ट हो जाते हैं।
मैं हाथ जोड़कर भारत के सभी किसान भाइयों और बहनों से प्रार्थना कर रहा हूँ ‘पराली मत जलाइए’, पराली का उचित प्रबंधन कीजिए।
अब ऐसी मशीनें आ गई हैं, जो पराली का प्रबंधन करने में मदद करती हैं। अभी हमने एक मशीन देखी, जो पराली को काटकर खेत में फैला देती है। दूसरी मशीन उसे इकट्ठा करती है और तीसरी मशीन उसके बंडल बना देती है।
इन बंडलों को बेचकर किसान अतिरिक्त आय भी प्राप्त कर सकते हैं। पराली को खेत में मिलाने से वह सड़कर जैविक पदार्थ और कार्बन बढ़ाने में भी मदद कर सकती है।
इसलिए मैं हरियाणा सरकार, मुख्यमंत्री जी, कृषि मंत्री जी और पूरी टीम को बधाई देता हूँ कि वे पराली प्रबंधन के लिए प्रयास कर रहे हैं।
हरियाणा में पराली न जलाने और सीधे बीज बोने की तकनीक अपनाने पर किसानों को प्रोत्साहन राशि भी दी जा रही है। धान की कटाई के बाद खेत में बची नमी का उपयोग करके गेहूँ की सीधी बिजाई की जा सकती है। इससे पानी की बचत होती है और उत्पादन बनाए रखने में मदद मिल सकती है। सरकार इसके लिए अलग से आर्थिक सहायता भी देती है।
मैं हरियाणा सरकार की विशेष रूप से प्रशंसा करता हूँ। धरती को बचाने के लिए यहाँ जो प्रयास किए जा रहे हैं, उनके लिए मुख्यमंत्री जी और कृषि मंत्री जी का अभिनंदन करता हूँ।
फसल के दाम और फसल विविधीकरण भी महत्वपूर्ण विषय हैं। अगर किसान धान की जगह दूसरी फसल उगाते हैं, तो उन्हें प्रोत्साहित करने के लिए क्या व्यवस्था की जा रही है? मुझे बताया गया कि दूसरी फसल अपनाने पर आठ हजार रुपये तक की सहायता दी जाती है।
हरियाणा सरकार ऐसे अनेक उपाय कर रही है। देश की दूसरी राज्य सरकारों को भी किसानों और मिट्टी के हित में ऐसे प्रयास करने चाहिए।
इसलिए पराली का उचित प्रबंधन कीजिए और सीधी बिजाई को बढ़ावा दीजिए। अब धान की भी सीधी बिजाई की जा सकती है। इसके लिए भी प्रोत्साहन राशि दी जा रही है।
राणा जी, यह तो कमाल की बात है—किसानों को अलग-अलग योजनाओं के तहत आठ हजार रुपये, साढ़े चार हजार रुपये और बारह सौ रुपये जैसी सहायता मिल रही है। बाकी राज्यों में ऐसे प्रयास उतने व्यापक रूप में दिखाई नहीं देते, जितने हरियाणा में किए जा रहे हैं।
हरियाणा अद्भुत है और यहाँ के किसान भी अद्भुत हैं। मैं उन्हें कितनी बार प्रणाम करूँ, कम है। हरियाणा के किसान मध्य प्रदेश में भी खेती करने जा रहे हैं। हरियाणा का किसान जहाँ पहुँचता है, वहाँ अपनी मेहनत और नई तकनीकों से आसपास की खेती को बदलने में योगदान देता है।
हरियाणा के किसान मेहनत और नई तरकीबों से खेती करते हैं। उन्हें पूरे देश को दिशा देनी चाहिए। इसी भावना के साथ मैं, शिवराज सिंह चौहान, आपका सेवक और आपका कृषि मंत्री, आज तरावड़ी आया हूँ। यहाँ आकर मुझे बहुत प्रसन्नता हुई है।
प्रधानमंत्री जी के आह्वान पर हमें धरती को बचाने का संकल्प लेना है। प्रधानमंत्री जी के मन में भी यह चिंता है कि हमारी धरती का स्वास्थ्य अच्छा क्यों नहीं रहना चाहिए? हमारे खेत स्वस्थ क्यों नहीं होने चाहिए?
मेरे भाइयों और बहनों, इंसान का स्वास्थ्य भी प्रभावित हो रहा है। कीटनाशकों और रासायनिक खाद के अत्यधिक इस्तेमाल से पैदा हुई उपज के सेवन और दूसरे कारणों से स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर हमें गंभीरता से विचार करना चाहिए। हमें खेत को भी बचाना है और इंसान को भी।
मेरे किसान मित्रों, कृषि विश्वविद्यालयों से जुड़े साथियों और आईसीएआर के वैज्ञानिकों, आज आप सभी से मैं आह्वान कर रहा हूँ कि 22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक गाँव-गाँव जाएँ। लोगों के बीच जागरूकता फैलाएँ। जब तक लोग इस बात को समझ न लें, उन्हें समझाते रहें।
खेत बचाने का यह पवित्र और महान काम है। इसे सब मिलकर करें। मैं भी इस अभियान में लगातार सक्रिय रहूँगा। आप भी सक्रिय रहें, ताकि भारत की धरती सुरक्षित और उपजाऊ बनी रहे।
यहाँ ग्रीन अमोनिया का एक प्रयोग भी शुरू हुआ है। अभी हम खाद विदेशों से मँगवाते हैं। आप जानते हैं कि मध्य-पूर्व के संकट के कारण खाद की अंतरराष्ट्रीय कीमतों और आपूर्ति पर दबाव पड़ सकता है। ऐसी परिस्थितियों में भारत को खाद के मामले में आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास बहुत महत्वपूर्ण हैं।
मैं भारत के किसानों की तरफ से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी को धन्यवाद देना चाहता हूँ। आपने यह सुनिश्चित किया है कि यूरिया की बोरी किसानों को 266 रुपये में ही मिले, चाहे उसकी लागत कितनी भी बढ़ जाए। इसी तरह डीएपी की बोरी 1,350 रुपये में उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।
खाद पर दी जाने वाली सरकारी सब्सिडी भी बहुत बड़ी है। पिछले वर्ष यह लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये थी और अब इसके चार लाख करोड़ रुपये के आसपास पहुँचने की बात कही जा रही है। भारतीय जनता पार्टी की सरकार का संकल्प है कि किसानों पर महँगी खाद का बोझ न पड़े।
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि खाद सस्ती मिल रही है, इसलिए उसे जरूरत से ज्यादा डालते जाएँ। इससे खेत को नुकसान होता है। इसलिए, मेरी बहनों और भाइयों, आइए संकल्प लें कि हम खाद का संतुलित उपयोग करेंगे। कीटनाशकों का भी संतुलित उपयोग करेंगे। खेत को बचाने के लिए सभी आवश्यक उपाय करेंगे और फसल चक्र में भी बदलाव लाएँगे।
हम अपनी धरती माता को बचाएँगे, अपने स्वास्थ्य को बचाएँगे, आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित करेंगे और भारत को भी बचाएँगे।
यहाँ ग्रीन अमोनिया का जो प्रयोग शुरू हुआ है, उससे खाद के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में भी सहायता मिल सकती है। इस प्रयोग के लिए मैं सभी को शुभकामनाएँ देता हूँ।
मैं आपसे अपील करता हूँ कि तरावड़ी की इस पवित्र धरती पर मेरे साथ संकल्प लीजिए—हम खाद का संतुलित उपयोग करेंगे, अनावश्यक खाद नहीं डालेंगे और अपने खेतों को बचाएँगे।
इस संकल्प के लिए दोनों हाथ ऊपर उठाइए, दोनों मुट्ठियाँ बाँधिए और भारत माता की जय बोलकर खेत बचाने का संकल्प लीजिए।
तरावड़ी के किसान भाइयों और बहनों, आज इस धरती पर खड़े होकर दोनों हाथ ऊपर उठाइए, मुट्ठियाँ बाँधिए और संकल्प लीजिए कि खेत बचाने के लिए खाद का संतुलित उपयोग करेंगे। फसल चक्र में बदलाव लाएँगे और धीरे-धीरे प्राकृतिक एवं जैविक खेती की ओर भी बढ़ेंगे।
बोलिए, भारत माता की जय!
भारत माता की जय!
भारत माता की जय!
हरियाणा की जनता की जय!
बहुत-बहुत धन्यवाद!
आज मैं यहाँ आया हूँ, तो राणा जी, हरियाणा के हमारे गरीब भाई-बहनों के लिए भी एक महत्वपूर्ण जानकारी देना चाहता हूँ। इस बार केंद्र सरकार की ओर से प्रधानमंत्री आवास योजना के अंतर्गत हरियाणा में 28,422 घरों की स्वीकृति दी जा रही है। इसके लिए 341 करोड़ 6 लाख रुपये की राशि निर्धारित की गई है।
इन घरों की स्वीकृति से संबंधित पत्र मैं आपको सौंप रहा हूँ, ताकि हरियाणा के गरीब परिवारों को पक्के मकान मिल सकें।
बहुत-बहुत धन्यवाद।








