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आज देश की पूरी ‘टीम एग्रीकल्चर’ यहां एक साथ बैठी है। पहले जब इस तरह के सम्मेलन होते थे, तो वे प्रायः एक दिन के होते थे। कई बार राज्यों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाता था और योजनाओं के क्रियान्वयन की समीक्षा भी उस तरह नहीं हो पाती थी, जिस तरह होनी चाहिए। इसलिए हमने इस पूरे सम्मेलन का प्रारूप बदलने का प्रयास किया है।
सबसे पहले हमने रीजनल कॉन्फ्रेंस शुरू कीं। इस वर्ष दक्षिण भारत की रीजनल कॉन्फ्रेंस हैदराबाद में संपन्न हुई। इसके बाद राज्यों के सभी अधिकारी पूरी तैयारी के साथ यहां आते हैं। कई दिनों से इसकी तैयारियां चल रही थीं। यहां उन्हें विस्तार से चर्चा करने का अवसर मिलता है कि किस कार्यक्रम का क्रियान्वयन किस प्रकार हो रहा है, उसमें क्या कठिनाइयां हैं, लक्ष्य क्या थे और उनमें से कितने लक्ष्य हम प्राप्त कर पाए हैं।
मैं माननीय कृषि मंत्रियों को बताना चाहता हूं कि कल हमारे अधिकारी साथी सुबह 10 बजे से लेकर रात 8 बजे तक बैठे रहे। राज्यों के अधिकारी भी पूरे दिन बैठकर अपने-अपने राज्यों की कृषि स्थिति पर चिंतन और मंथन करते रहे। हमने भी इस चर्चा को बीच में नहीं छोड़ा और पूरे समय उनके साथ उपस्थित रहे। कल कई बहुत महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तार से चर्चा हुई है।
पिछले वर्षों की उपलब्धियों की बात करें तो मैं बहुत विस्तार में नहीं जाऊंगा, लेकिन गर्व के साथ यह जरूर कहना चाहता हूं कि हमने पिछले कुछ वर्षों में महत्वपूर्ण प्रगति की है।
वर्ष 2015 के बाद देश की कृषि विकास दर, जो पहले लगभग 3 प्रतिशत के आसपास रहती थी, अब बढ़कर 4.5 प्रतिशत हो गई है। इस विषय पर महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट आगे विस्तार से प्रस्तुति देंगे। मैं इस असाधारण उपलब्धि के लिए सभी राज्यों को बधाई देता हूं।
देश के खाद्यान्न उत्पादन में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। खाद्यान्न उत्पादन में वार्षिक औसत वृद्धि पहले लगभग 40 लाख टन थी, जो अब बढ़कर 84 लाख टन हो गई है।
बी की बात करें तो वर्ष 2023-24 से 2025-26 के बीच रबी खाद्यान्न उत्पादन में लगभग 205 लाख टन की वृद्धि हुई है। रबी खाद्यान्न उत्पादन बढ़कर करीब 1,805 लाख टन हो गया है। इसमें सभी का योगदान है। राज्य बेहतर काम करते हैं, तभी देश आगे बढ़ता है।
इसलिए हम सभी की जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। चाहे हम कृषि मंत्री हों, राज्यों के अपर मुख्य सचिव हों, कृषि सचिव हों या विभाग के अन्य अधिकारी, कृषि की रणनीति और योजनाएं बनाना, उनका प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना, देश की खाद्य सुरक्षा बनाए रखना और किसानों की आजीविका को बेहतर बनाना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है। हमें प्रयास करना चाहिए कि इसमें कोई कसर न रह जाए।
मैं इस सम्मेलन में आने के लिए इसलिए भी बहुत आग्रहशील था क्योंकि हमारा उद्देश्य केवल योजनाओं की समीक्षा करना नहीं, बल्कि राज्यों के साथ मिलकर कृषि को आगे बढ़ाना है।
पार्टी कोई भी हो, सरकारें आती-जाती रहती हैं, पार्टियां बनती और बिगड़ती रहती हैं, लेकिन देश हमेशा रहने वाला है और किसान हमेशा रहने वाले हैं।
मैं इस मंच से स्पष्ट करना चाहता हूं कि यहां कोई पार्टी पॉलिटिक्स नहीं है। हमारा एक ही उद्देश्य है कि खेती बेहतर कैसे हो, किसान आगे कैसे बढ़े और हर राज्य के साथ मिलकर हम कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का समाधान कैसे करें।
हमने इसी उद्देश्य से एक व्यवस्थित प्रणाली विकसित करने का प्रयास किया है।
मैं हर सप्ताह अपने अधिकारियों के साथ कृषि क्षेत्र की साप्ताहिक समीक्षा करता हूं। सप्ताह भर में कृषि से जुड़ी क्या समस्याएं सामने आईं, कहीं रोगों का प्रकोप तो नहीं है, कहीं कम बारिश या ज्यादा बारिश की स्थिति तो नहीं है, कहीं कीमतों में उतार-चढ़ाव तो नहीं है, इन सभी विषयों की समीक्षा की जाती है। मेरा मानना है कि राज्य स्तर पर भी कृषि मंत्री ऐसी साप्ताहिक समीक्षा करते होंगे।
खेती पर जब तक निरंतर ध्यान नहीं दिया जाएगा और नेतृत्व स्तर पर इसकी नियमित निगरानी नहीं होगी, तब तक अपेक्षित परिणाम हासिल करना कठिन होगा।
अब मेरे मन में यह विचार आया है कि केंद्र और राज्यों के बीच हर महीने एक नियमित वर्चुअल समीक्षा बैठक भी होनी चाहिए। इसके लिए राज्यों को दिल्ली आने की आवश्यकता नहीं होगी। हम वर्चुअली जुड़ेंगे और संबंधित राज्य की कृषि स्थिति की समीक्षा करेंगे।
जहां कोई समस्या नहीं है, वहां अनावश्यक रूप से विस्तार में जाने की जरूरत नहीं होगी। लेकिन जहां कोई चुनौती है, वहां राज्य केंद्र को अपनी बात बताए और केंद्र भी राज्य को अपनी ओर से आवश्यक सहयोग और जानकारी दे। मिलकर उस समस्या का समाधान निकालने का प्रयास किया जाएगा।
कृषि राज्य का विषय है और जमीन पर काम राज्यों को ही करना है। केंद्र सरकार राज्यों का सहयोग और मार्गदर्शन करती है। इसलिए केंद्र और राज्यों के बीच निरंतर संपर्क और समन्वय जरूरी है।
मैं स्वयं कृषि मंत्रियों के साथ सीधा संपर्क बनाए रखने का प्रयास करता हूं। कई बार लगातार संपर्क हो पाता है और कई बार संभव नहीं हो पाता। लेकिन यदि हम मासिक समीक्षा की एक व्यवस्थित व्यवस्था बना लेते हैं, तो किसी भी समस्या पर समय रहते चर्चा की जा सकेगी। हम दो या तीन घंटे वर्चुअली जुड़कर विस्तार से चर्चा कर सकते हैं। यदि कोई समस्या नहीं है और सब ठीक चल रहा है, तो हम आगे बढ़ेंगे।
राज्यों में कृषि की टीम पहले से है। लेकिन मेरा आग्रह है कि एक ऐसी व्यवस्थित राज्य कृषि टीम विकसित की जाए, जो लगातार मिलकर काम करे।
इस टीम में कृषि मंत्री, कृषि सचिव और विभाग के अन्य अधिकारी तो रहें ही, लेकिन इसके साथ-साथ राज्य के कृषि विश्वविद्यालयों को भी जोड़ा जाए।
आईसीएआर के संस्थानों के वैज्ञानिकों को भी राज्य की कृषि टीम के साथ जोड़ा जाना चाहिए। कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs) को मजबूत करने की आवश्यकता है। यदि कोई कृषि विज्ञान केंद्र प्रभावी ढंग से काम करता है, तो वह पूरे जिले की खेती की दिशा और दशा बदल सकता है।
इसलिए KVK और ATMA की टीम किस तरह मिलकर काम कर सकती है, इस पर भी ध्यान देना होगा।
इस टीम में प्रगतिशील किसानों और FPOs को भी जोड़ा जा सकता है। कई स्थानों पर FPOs बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। जहां वे अच्छा काम नहीं कर पा रहे हैं, वहां उन्हें आगे बढ़ाना भी हमारी जिम्मेदारी है।
इसी तरह SHG की दीदियां भी खेती के क्षेत्र में बहुत अच्छा काम कर रही हैं। राज्यों को विचार करना चाहिए कि इन सभी को जोड़कर एक मजबूत राज्य कृषि टीम बनाई जाए, जो महीने में कम से कम एक बार बैठकर चर्चा करे।
भारत सरकार ने प्रत्येक राज्य के लिए एक नोडल अधिकारी भी नियुक्त किया है। वह नोडल अधिकारी राज्य के संपर्क में रहेगा। आप उसे भी अपनी राज्य कृषि टीम में जोड़ सकते हैं।
किसी भी उपलब्धि को टीम मिलकर ही हासिल करती है और इस टीम का नेतृत्व राज्य के कृषि मंत्री को करना होगा।
इसी तरह हमें जिला स्तर की कृषि टीम को भी मजबूत करना होगा। आखिर कृषि का वास्तविक काम जिले, ब्लॉक और गांव में होना है।
जिला स्तर की टीम में कलेक्टर, डीडीए, ATMA, KVK, प्रगतिशील किसान और आवश्यकता के अनुसार बैंकर्स को भी जोड़ा जा सकता है, विशेषकर KCC और अन्य वित्तीय विषयों के लिए।
मेरा मानना है कि ऐसी मजबूत जिला कृषि टीम महीने में एक बार अवश्य बैठे। इसमें कलेक्टर को भी जोड़ना जरूरी होगा।
हर जिले की परिस्थिति अलग होती है। वहां की एग्रो-क्लाइमेटिक कंडीशन, मिट्टी में नमी और पानी की उपलब्धता अलग-अलग होती है। इसलिए ऊपर से लेकर नीचे तक एक मजबूत कृषि टीम विकसित होनी चाहिए।
इस वर्ष की तैयारी की बात करें तो देश में लगभग 14 प्रतिशत बारिश कम हुई है। कुछ स्थानों पर सामान्य से अधिक बारिश भी हुई है।
पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में बारिश थोड़ी कम होने के बावजूद बहुत अधिक अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि वहां सामान्यतः बारिश पर्याप्त मात्रा में होती है। लेकिन कर्नाटक, महाराष्ट्र, तेलंगाना के कुछ हिस्सों और आंध्र प्रदेश में कम बारिश के कारण समस्याएं सामने आई हैं।
अन्य राज्यों में भी कुछ जिलों में कम और कुछ में ज्यादा बारिश हुई है। कहीं-कहीं बाढ़ से भी नुकसान हुआ है।
इसलिए अब रबी की बुवाई की योजना बनाते समय हमें पानी की उपलब्धता और मिट्टी में नमी को ध्यान में रखना होगा।
कल मैंने भी कहा था कि पानी कितना उपलब्ध है, उसके आधार पर यह तय होना चाहिए कि कौन-सी फसल और कौन-सी किस्म बोई जाए। यदि पानी कम है और हम अधिक पानी की जरूरत वाली फसल बो देते हैं, तो बाद में फसल खराब हो सकती है। इसलिए राज्य के माननीय कृषि मंत्रियों और उनकी टीम को इस पर विशेष ध्यान देना होगा।
बीज के विषय पर कल विस्तार से चर्चा हुई। देश में बीज की कोई कमी नहीं है।
कल पंजाब ने बीज की आवश्यकता बताई थी। मैं अपनी टीम को बधाई दूंगा कि हमने तत्काल पंजाब की अपेक्षा के अनुसार बीज की स्वीकृति दे दी।
बीज पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है। लेकिन इसकी सही योजना बनाना जरूरी है कि किस राज्य में इस समय कौन-सी नई और उपयुक्त किस्म प्रासंगिक है।
मैंने ICAR से भी कहा है कि जो नई किस्में जारी की गई हैं, उनमें से किस राज्य के लिए इस समय कौन-सी किस्म उपयुक्त है, इसकी जानकारी राज्यों को पहले से होनी चाहिए।
उर्वरक की भी कोई कमी नहीं है। लेकिन यह सुनिश्चित करना जरूरी है कि उर्वरक का वितरण ठीक ढंग से हो। इस विषय पर फर्टिलाइजर सेक्रेटरी भी अपनी बात रखेंगे।
साथ ही, यदि किसी फसल में रोग का प्रकोप होता है, तो उसके लिए भी हमें पहले से पूरी तैयारी रखनी होगी।
कल राज्यों के साथ किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) को लेकर भी व्यापक चर्चा हुई।
मैं माननीय कृषि मंत्रियों से कहना चाहता हूं कि कई राज्यों में अभी भी सभी किसानों के KCC नहीं बने हैं। यदि अच्छी फसल पैदा करनी है तो किसान के पास पर्याप्त पूंजी होना जरूरी है। KCC के माध्यम से कम ब्याज पर पर्याप्त राशि उपलब्ध हो सकती है।
इसलिए मेरा आग्रह है कि प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के जितने लाभार्थी हैं, कम से कम उतने KCC भी बनें।
इस विषय पर कल आपकी टीमों के साथ विस्तार से चर्चा हुई है। राज्यों को इस दिशा में तेजी से काम करना चाहिए।
इसके साथ ही प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना पर भी ध्यान देना जरूरी है। अभी 25 राज्य इसके साथ आ चुके हैं।
यह वर्ष अलनीनो के कारण कुछ चुनौतियों वाला है। इसलिए हमें फसल बीमा योजना के कवरेज के बारे में भी विचार करना चाहिए।
फसल बीमा योजना में Crop Cutting Experiments (CCE) कई बार विवाद का विषय बनते हैं। कई बार किसान कहते हैं कि उन्हें नुकसान हुआ है और कई बार भुगतान को लेकर शिकायतें आती हैं।
इसलिए मेरा आग्रह है कि YES-TECH के साथ-साथ Crop Cutting Experiments भी किए जाएं। विशेषकर ऐसी फसलों में, जहां केवल YES-TECH के माध्यम से आकलन को लेकर संदेह रहता है, जैसे सोयाबीन।
हम पूरी तरह केवल YES-TECH पर निर्भर न रहें और आवश्यकतानुसार कुछ Crop Cutting Experiments भी करें, ताकि व्यवस्था अधिक पारदर्शी और विश्वसनीय बन सके।
एक और महत्वपूर्ण विषय है पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट। किसान की उपज के भंडारण से लेकर उसकी बिक्री तक की पूरी व्यवस्था मजबूत होनी चाहिए।
किसान को उसकी उपज का उचित दाम मिले, यह हम सभी की जिम्मेदारी है।
इसके लिए दोनों व्यवस्थाओं पर काम करना होगा। एक ओर MSP आधारित व्यवस्था है और दूसरी ओर किसानों को बाजार से सीधे जोड़ने की व्यवस्था है।
हमें देखना होगा कि किसान को बाजार से किस तरह बेहतर तरीके से जोड़ा जाए, ताकि उसे अपनी उपज का उचित मूल्य मिल सके।
कल दलहन मिशन पर भी चर्चा हुई थी। मैं उसके बारे में बहुत विस्तार में नहीं जाऊंगा, लेकिन यह तय किया गया है कि तुअर, मसूर और उड़द की 100 प्रतिशत खरीद सरकार करेगी।
लेकिन खरीद की तैयारी पहले से करनी होगी। यदि किसान की उपज खरीदने की व्यवस्था समय पर नहीं हुई तो किसान मजबूरी में अपनी उपज व्यापारी को बेच देगा। बाद में वही उपज बाजार में घूमकर फिर किसान के पास आती है, लेकिन उस समय किसान के पास अपनी उपज नहीं रहती।
इसलिए मेरा माननीय कृषि मंत्रियों से आग्रह है कि खरीफ हो या रबी, सरकारी खरीद की पूरी व्यवस्था पहले से तैयार रखें।
कई बार सरकारी खरीद लंबे समय तक चलती है। जितना लंबा समय खरीद में लगता है, उतनी ही गड़बड़ियों की संभावनाएं भी बढ़ती हैं।
इसलिए खरीद की ऐसी व्यवस्था पहले से तैयार हो कि किसान की उपज समय पर खरीदी जाए और 48 घंटे के भीतर किसान को भुगतान मिल जाए।
अब हमें बाजार को भी ध्यान में रखना होगा।
कृषि सचिव संभवतः अपनी प्रस्तुति में इस विषय पर विस्तार से बताएंगे।दुनिया के विभिन्न देशों के साथ भारत के जो Free Trade Agreements (FTAs) हुए हैं, उनमें भारतीय किसानों के लिए नए अवसर हैं।
कई कृषि उत्पाद ऐसे हैं, जो शून्य प्रतिशत आयात शुल्क पर दुनिया के बाजारों में पहुंच सकते हैं।
अब राज्यों को इस दिशा में तैयारी करनी होगी कि हम export quality के कृषि उत्पाद तैयार करें।
हमारे कृषि उत्पाद, फल, सब्जियां और अनाज दुनिया भर के बाजारों में जा सकते हैं। लेकिन इसके लिए कुछ निर्धारित शर्तें और गुणवत्ता मानक हैं। हमें उन मानकों को पूरा करना होगा और इसके लिए राज्यों को अभी से तैयारी करनी होगी।
चाहे European Union हो, UK हो या दुनिया के अन्य देश, मैं आज गर्व के साथ कह सकता हूं कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के मार्गदर्शन में भारत ने जो भी समझौते किए हैं, उनमें किसानों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई है।
प्रधानमंत्री जी ने स्पष्ट कहा है कि किसानों के हितों के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
अमेरिका के साथ भी जो चर्चा चल रही है, वह अभी बातचीत के स्तर पर है। लेकिन हमारा प्रयास स्पष्ट है कि किसानों के हित प्रभावित न हों। हमारे अनाज, फल, डेयरी उत्पाद और अन्य कृषि हितों की सुरक्षा सर्वोपरि है।
मैं राज्यों से आग्रह करूंगा कि वे FTAs के सभी प्रावधानों को ध्यान से देखें और यह पहचानें कि उनके राज्य से कौन-कौन से कृषि उत्पाद निर्यात किए जा सकते हैं। उसके लिए आवश्यक तैयारी अभी से करनी होगी। साथ ही,
अपने घरेलू बाजार में भी किसानों को उनकी उपज का उचित दाम मिले, इसके लिए प्रत्येक राज्य को अपनी व्यवस्था मजबूत करनी चाहिए।
यह व्यवस्था मंडियों के माध्यम से हो, अन्य बाजारों के माध्यम से हो या फार्म गेट पर बिक्री के माध्यम से, राज्य अपने अनुसार सबसे उपयुक्त व्यवस्था अपना सकते हैं।
यदि किसान को बाजार से सही तरीके से जोड़ दिया जाए तो उसे बेहतर मूल्य मिलने की संभावना बढ़ती है। इस दिशा में राज्यों को गंभीरता से काम करना चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण निर्णय हमने लिया है, वह है ‘खेत बचाओ अभियान’।
मैंने कहा कि देश में खाद की पर्याप्त उपलब्धता है, लेकिन दो बातों पर विशेष ध्यान देना जरूरी है।
पहली बात, खाद की कालाबाजारी नहीं होनी चाहिए। इसे रोकने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी राज्यों की है। पिछले वर्ष की तुलना में इस बार अधिक खाद उपलब्ध है।
हमने कुछ राज्यों में दो-दो जिलों में पायलट प्रोजेक्ट भी किए हैं, जिनमें Farmer ID के माध्यम से खाद वितरण का प्रयास किया गया। दक्षिण के राज्यों को मैं बधाई दूंगा कि जिन जिलों में यह व्यवस्था लागू की गई, वहां इसके कारण वितरण व्यवस्था काफी बेहतर हुई।
दूसरी महत्वपूर्ण बात है कि खाद के साथ जबरन टैगिंग नहीं होनी चाहिए।
किसान अक्सर शिकायत करते हैं कि खाद की एक बोरी के साथ किसी दूसरी वस्तु को खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है।
मैं स्पष्ट रूप से कहना चाहता हूं कि कोई भी किसान को यह बाध्य नहीं कर सकता कि यूरिया या DAP की बोरी के साथ कोई दूसरी वस्तु भी खरीदे। सभी राज्य इस बात पर विशेष ध्यान दें कि कहीं भी जबरन टैगिंग न हो।
अमानक और नकली खाद, बीज तथा कीटनाशकों के खिलाफ हर राज्य में कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
राजस्थान जैसे राज्यों में इस दिशा में अच्छी कार्रवाई हो रही है, इसके लिए मैं उन्हें बधाई दूंगा। कुछ राज्यों में कार्रवाई अपेक्षाकृत कम है। मैं अभी किसी राज्य का नाम नहीं ले रहा हूं।
कई बार कार्रवाई तो होती है, लेकिन हमारी प्रयोगशालाओं की रिपोर्ट के बाद भी जहां उत्पाद अमानक पाए जाते हैं, वहां संबंधित लोगों के खिलाफ वैधानिक कार्रवाई में कमी दिखाई देती है।
नकली कृषि सामग्री बेचना किसान के साथ सबसे बड़ा धोखा है और राष्ट्र के प्रति अपराध है।
नकली, घटिया और अमानक सामग्री बेचने वालों को किसी भी कीमत पर नहीं छोड़ा जाना चाहिए। यह हमारा संकल्प होना चाहिए। सभी राज्यों को इस दिशा में गंभीरता से काम करना होगा।
खेत बचाओ अभियान’ के कई आयाम हैं।
खेत में खाद जरूर डाली जाए, लेकिन संतुलित मात्रा में डाली जाए। आवश्यकता से अधिक खाद का उपयोग जमीन की सेहत खराब करता है और मित्र कीटों को नुकसान पहुंचाता है।
यदि हमने अभी से ध्यान नहीं दिया तो आने वाली पीढ़ियों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
इसलिए Soil Health Card के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग जरूरी है। हर राज्य को इस दिशा में विशेष ध्यान देना होगा।
इसके लिए किसानों को जागरूक करना होगा। अक्सर एक किसान जितनी मात्रा में एक खाद डालता है, दूसरा भी उसी अनुपात में डाल देता है, जबकि मिट्टी की वास्तविक आवश्यकता अलग हो सकती है।
इसीलिए कल की चर्चा में यह बात सामने आई कि 22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक पूरे देश में ‘खेत बचाओ अभियान’ चलाया जाए। मैं राज्यों से आग्रह करूंगा कि इसे गंभीरता से लें। वैज्ञानिकों को भी इस अभियान से जोड़ा जाएगा।
राज्यों द्वारा तय किए गए कार्यक्रमों के बीच वैज्ञानिक किसानों के बीच जाएंगे और उन्हें जागरूक करेंगे कि उनकी मिट्टी की स्थिति के अनुसार कितनी खाद पर्याप्त है।
खेत बचाओ अभियान’ का एक दूसरा महत्वपूर्ण पहलू इस वर्ष की परिस्थिति के संदर्भ में है।
हमें यह देखना होगा कि किसान कौन-सी फसल और कौन-सी किस्म बोए। यदि पानी कम है तो कम पानी में होने वाली फसलों, विशेषकर दलहन की ओर कैसे बढ़ा जा सकता है, इस पर विचार करना होगा।
यदि पानी कम होने के बावजूद ज्यादा पानी की जरूरत वाली फसल बो दी गई तो फसल खराब हो सकती है।
इसलिए पानी की उपलब्धता, मिट्टी की नमी और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए फसल योजना बनानी होगी।
‘खेत बचाओ अभियान’ के अंतर्गत Rice Fallow क्षेत्रों में दलहन की खेती को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।
पूर्वी भारत के राज्यों, विशेषकर झारखंड, बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल, में धान की कटाई के बाद बड़ी मात्रा में जमीन खाली रहती है।
इन क्षेत्रों में रबी मौसम में दलहन की खेती को बढ़ावा देकर दलहन का क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है और किसानों की आय में भी वृद्धि की जा सकती है।
इसलिए ‘खेत बचाओ अभियान’ के अंतर्गत ऐसे सभी उपायों को शामिल किया जाना चाहिए, जो उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ जमीन की सेहत को भी सुरक्षित रखने में मदद करें।
हम 22 अक्टूबर से 30 नवंबर तक इस अभियान को व्यापक रूप से चलाएंगे। 22 अक्टूबर को अभियान की शुरुआत के लिए मैं स्वयं भी जाऊंगा। माननीय कृषि मंत्रीगण भी अपने-अपने राज्यों में जाएं। हमारे अधिकारी भी जहां तक संभव हो, किसानों के बीच जाएं। राज्य की पूरी टीम और वैज्ञानिक भी इसमें भाग लें।
यह एक व्यापक जन-अभियान होना चाहिए।
एक और विषय पर हमने चर्चा की है। हम चाहते हैं कि पूरे देश में एक ही दिन जिला स्तर पर कृषि की विशेष बैठकें आयोजित हों, ताकि रबी और खरीफ की तैयारी समय पर और व्यवस्थित तरीके से हो सके।
यदि यहां से तारीख तय कर दी जाती है, तो पूरे देश के जिलों में एक साथ तैयारी की जा सकेगी।
मैंने पहले जिस जिला कृषि टीम की बात कही है, उसमें कलेक्टर भी रहें। जिले के प्रभारी मंत्री भी इसमें शामिल हो सकते हैं। आप अपने मुख्यमंत्री जी से भी इस संबंध में चर्चा करें, मैं भी चर्चा करूंगा।
जिला स्तर पर कलेक्टर, DDA, ATMA, KVK, कृषि विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि, प्रगतिशील किसान और अन्य संबंधित पक्षों को इसमें जोड़ा जा सकता है।
हमने वर्षभर के लिए एक कैलेंडर तय करने की दिशा में चर्चा की है: रबी अभियान: 10 सितंबर को जिला स्तरीय बैठक और 17 सितंबर को राज्य स्तरीय बैठक।
खरीफ अभियान: 10 मई को जिला स्तरीय बैठक और 17 मई को राज्य स्तरीय बैठक।
इस वर्ष रबी की जिला स्तरीय बैठक जहां नहीं हो पाई है, वहां राज्य अपनी सुविधा के अनुसार तत्काल यह बैठक कर लें, ताकि रबी की बेहतर तैयारी की जा सके।
प्राकृतिक खेती, Integrated Farming और Crop Diversification
योजनाओं के क्रियान्वयन पर कल विस्तार से चर्चा हो चुकी है। मैं सभी माननीय कृषि मंत्रियों से आग्रह करूंगा कि वे योजनाओं की नियमित समीक्षा करते रहें।
प्राकृतिक खेती पर रबी में विशेष ध्यान देने की जरूरत है। यह इसका उपयुक्त समय है। प्राकृतिक खेती के क्लस्टर तैयार किए जा चुके हैं और राज्यों ने भी आवश्यक तैयारियां की हैं। इस वर्ष हम इसे और आगे बढ़ा सकते हैं।
इसके साथ ही Integrated Farming और Crop Diversification पर भी अधिकतम ध्यान देने का प्रयास होना चाहिए।
हम यहां केवल रबी की तैयारी के लिए नहीं बैठे हैं। यह सम्मेलन वर्ष में एक बार होता है, इसलिए हम यहां पूरे वर्ष की कृषि रणनीति और योजना पर विचार कर रहे हैं।
रबी की तैयारी को लेकर कल विस्तार से चर्चा हुई है।
उससे पहले जिलों में भी चर्चा हुई है। मैं सभी अधिकारियों से एक बार फिर आग्रह करूंगा कि अपने राज्य के कृषि मंत्री के मार्गदर्शन में अपने-अपने जिलों में रबी की तैयारी की समीक्षा कर लें।
यदि किसी जिले में सूखे की स्थिति है, तो वहां कौन-से वैकल्पिक बीज और कौन-सी फसलें ली जा सकती हैं, इसकी योजना पहले से तैयार होनी चाहिए।
बीज की उपलब्धता के लिए केंद्र सरकार हर संभव सहयोग करेगी। पंजाब के कृषि मंत्री भी अभी आए हैं। मैंने पहले बताया कि पंजाब ने कल बीज की मांग की थी और हमने उनकी मांग के अनुसार बीज की स्वीकृति तत्काल दे दी है।
राज्य बीज के लिए जो भी आवश्यकता बताएंगे, केंद्र सरकार की ओर से हर संभव सहयोग किया जाएगा।
अब हम राज्यों की स्थिति पर आधारित प्रस्तुतियां भी देखेंगे। कल की समीक्षा के दौरान जो बातें सामने आई हैं, वे प्रस्तुतियों के माध्यम से आपके सामने रखी जाएंगी।
अपने-अपने राज्य की स्थिति को ध्यान में रखते हुए आप आगे की बेहतर तैयारी और कृषि की प्राथमिकताओं की योजना बना सकेंगे।
प्रेजेंटेशन सत्र पूरा होने के बाद दोपहर के भोजन के पश्चात माननीय कृषि मंत्री अपने-अपने राज्यों की स्थिति पर चर्चा करेंगे।
इससे उन्हें प्रस्तुतियों के आधार पर अपनी प्राथमिकताएं तय करने का अवसर मिलेगा। मैं एक बार फिर इस सफल रबी अभियान बैठक के लिए सभी राज्यों को बधाई देता हूं। राज्यों ने बहुत मेहनत की है। कई राज्यों ने असाधारण काम किया है, जो इन प्रस्तुतियों में सामने आएगा।
कुछ योजनाओं में कुछ राज्यों को अपना प्रदर्शन सुधारने की आवश्यकता है। मैं अभी किसी राज्य का नाम नहीं ले रहा हूं। प्रस्तुतियों में राज्यों के नाम और प्रदर्शन सामने आएंगे।
जहां कमियां हैं, वहां हमें इस भावना के साथ काम करना है कि उन कमियों को दूर करें। जो हमारी विशेषता है, उसे अपनी ताकत बनाएं और दूसरे राज्यों से सीखें।
कई राज्यों में बहुत अच्छी Best Practices हैं। जो राज्य अच्छा कर रहे हैं, उनसे सीखने और उनकी अच्छी व्यवस्थाओं को अपनाने का प्रयास किया जाना चाहिए।
मित्रों, हमारा संकल्प केवल एक है कि हम बेहतर से बेहतर Team Spirit के साथ मिलकर काम करें, अपनी कृषि को और मजबूत बनाएं और किसानों की आय बढ़ाएं।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने देश के सामने नए अवसरों का आह्वान किया है। उन्होंने लाल किले की प्राचीर से भी कहा है कि हमें बाजारों और दुनिया के बाजारों को ध्यान में रखते हुए अपनी कृषि को उन्नत बनाना होगा।
हमें देश की खाद्य सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी है और साथ ही भारत को दुनिया का Food Basket भी बनाना है।
दुनिया के बाजारों में भारत के उत्पाद अपनी पहचान बनाएं। हमारे प्राकृतिक खेती के उत्पाद, हमारे फल, हमारी सब्जियां और हमारा अनाज दुनिया के बाजारों तक पहुंचे।
इस दिशा में हम सभी को मिलकर दिन-रात काम करना होगा।
प्रारंभ में मुझे आप सभी के सामने इतना ही निवेदन करना था। माननीय कृषि मंत्रियों को सुनने के बाद यदि कोई और विषय रखना होगा, तो उस पर भी चर्चा करूंगा।








