Speech Transcript
हमारे क्रांतिकारी वीरों ने देश के लिए अपना जीवन न्योछावर कर दिया। उन्हें मेरा शत-शत नमन।
लेकिन आज हमें देश के लिए जीने की आवश्यकता है। हमें यह देखना होगा कि देश के लिए हम अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन कितनी निष्ठा और प्रतिबद्धता के साथ कर रहे हैं।
हम देख रहे हैं कि हमारे प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी विकसित और आत्मनिर्भर भारत के निर्माण के लिए दिन-रात प्रयास कर रहे हैं। वे परिश्रम की पराकाष्ठा कर रहे हैं और अपने प्रयासों की कोई सीमा नहीं रख रहे हैं।
मुझे प्रधानमंत्री जी का वह उद्बोधन कभी नहीं भूलता, जब उन्होंने कहा था कि तीसरे कार्यकाल में वे तीन गुना अधिक तेजी से काम करेंगे। मन में यह भाव आता है कि जब प्रधानमंत्री जी तीन गुना अधिक शक्ति और गति से काम करेंगे, तो हम भी पीछे क्यों रहें?
देश के लिए जीने का अर्थ यही है कि हमारे हिस्से में जो जिम्मेदारी आई है, उसे हम पूरी क्षमता और ईमानदारी के साथ निभाएं।
आप सभी यहाँ आए हैं और इतनी बड़ी संख्या में राज्यों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। यह अच्छी भागीदारी केवल औपचारिकता नहीं है, बल्कि हमारी जिम्मेदारी है। यदि इतनी महत्वपूर्ण बैठक के बाद भी कोई इसमें शामिल नहीं होता, तो यह चिंता का विषय है। मैं सभी राज्यों से आई इस अच्छी भागीदारी की सराहना करता हूँ।
हमने रबी और खरीफ की इन बैठकों को केवल एक औपचारिक कार्यक्रम बनकर नहीं रहने दिया है। पहले ऐसी बैठकें केवल एक दिन की होती थीं और उसमें सभी लोग शामिल भी नहीं होते थे। हमने इसे उद्देश्यपूर्ण बनाया है। हमारी क्षेत्रीय बैठकें भी लगातार आयोजित हो रही हैं। नॉर्थ ईस्ट की केवल एक बैठक अभी बाकी है, बाकी विभिन्न क्षेत्रों में जाकर हमने चर्चा की है।
आज हम रबी सम्मेलन के लिए यहाँ एकत्रित हुए हैं।
आप जानते हैं कि कृषि, अनाज, फल और सब्जियाँ भारत जैसे विशाल देश के लिए कितनी महत्वपूर्ण हैं। इस बात की खुशी है कि कृषि क्षेत्र में हमने लगातार प्रगति की है।
कल संभवतः विस्तार से बताया जाएगा कि कृषि के विकास और प्रगति के विभिन्न चरणों में 2015 से 2025 के बीच उत्पादन में कितनी वृद्धि हुई है। कृषि विकास दर में भी लगभग 50 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। कल ये आंकड़े तथ्यों के साथ हमारे सामने रखे जाएंगे।
हमारी उपलब्धियाँ बहुत हैं, लेकिन काम करने की गुंजाइश भी उतनी ही बड़ी है।
जब हम रबी की बात करते हैं तो खरीफ के समय हमारे मन में कई चिंताएँ थीं। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव अब स्पष्ट दिखाई दे रहा है। जिस समय हमारे यहाँ आमतौर पर तेज गर्मी हुआ करती थी, उस समय भी मौसम का मिजाज अलग दिखाई दे रहा है।
एक तरफ महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कई हिस्सों में सूखे का संकट देखने को मिला, वहीं दूसरी ओर उत्तर प्रदेश में अत्यधिक बारिश के कारण जनहानि की खबरें आईं। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव अब साफ दिखाई दे रहे हैं।
अल-नीनो के प्रभाव को लेकर भी हम चिंतित थे। इन परिस्थितियों के बावजूद हमारी पूरी टीम ने जिस तरह काम किया है, उसके लिए मैं आप सभी को बधाई देना चाहता हूँ।
जहां सूखे का संकट है, वहाँ सरकार आपके साथ है। मेरी महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री जी के साथ चर्चा हुई है। रबी की प्लानिंग वैज्ञानिक तरीके से करना होगी। जहां पाणी सीमित है, वहाँ कैसे प्रबंधन करें,
इस पर काम करना होगा। मुझे लगता है कि पानी की उपलब्धता के अनुसार फसलों का चुनाव करना चाहिए। मिट्टी में हम नमी कैसे बचाएं और बुवाई ठीक समय पर कैसे करें, इसकी तैयारी करें।
अब हमें आगे की तैयारी पर विशेष ध्यान देना है। यदि कल तक रबी फसल से संबंधित अभियान और तैयारियाँ पूरी हो जाएँ और हर राज्य यह स्पष्ट कर सके कि किस क्षेत्र में कितना दलहन बोया जाना है, तो मुझे विश्वास है कि हम बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।
इसके लिए सभी आवश्यक व्यवस्थाएँ की जानी चाहिए।
चना, मसूर और सरसों जैसी फसलों के मामले में हमें दलहन और तिलहन की ओर आगे बढ़ना है। इसके लिए सही क्षेत्र का चयन और सही तकनीक का उपयोग बहुत आवश्यक है।
ये जो मैं बोलता हूँ, ये केवल सभा का भाषण नहीं है कि हमने सुन लिया और हम चले गए। इसका इम्प्लीमेंटेशन भी कीजिए। कुछ लोग नोट्स ले रहे हैं, कुछ दिमाग में नोट कर रहे हैं, ये जरूरी है।
एक और महत्वपूर्ण विषय है, सुनिश्चित बाजार।
किसान स्वाभाविक रूप से वहीं अपनी उपज बेचेगा जहाँ उसे बेहतर मूल्य मिलेगा। इसलिए यदि हम खरीद की व्यवस्था को मजबूत नहीं करेंगे, तो केवल उत्पादन बढ़ाने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलेंगे। मैं केवल सरकारी खरीद की बात नहीं कर रहा हूँ, बल्कि पूरी मार्केटिंग व्यवस्था की बात कर रहा हूँ।
जहाँ तक सुधारों का सवाल है, राज्य अपनी परिस्थितियों और आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय ले सकते हैं। इसमें कोई समस्या नहीं है। सुधार होने चाहिए, लेकिन उनका उद्देश्य किसान का लाभ होना चाहिए।
राज्य अपने स्तर पर निर्णय लें। कृषि के विषय में केंद्र सरकार की ओर से आपको पूरा सहयोग मिलेगा।
इसलिए पूरी योजना पहले से तैयार होनी चाहिए और उसमें खरीद की व्यवस्था भी शामिल होनी चाहिए। किसान को यह भरोसा होना चाहिए कि यदि वह दलहन और तिलहन का उत्पादन करता है, तो उसकी उपज की खरीद की व्यवस्था भी सुनिश्चित होगी।
यहाँ NAFED और NCCF के प्रतिनिधि भी उपस्थित हैं। इस बार भारत सरकार ने यह निर्णय लिया है कि यदि राज्य सरकार खरीद नहीं करती है, तो NAFED और NCCF सीधे खरीद कर सकते हैं। लेकिन खरीद समय पर होनी चाहिए।
इसके लिए जो भी आवश्यक तैयारियाँ हैं, उन्हें पहले से पूरा किया जाना चाहिए। मंत्रीगण कल आएँगे, उनसे भी मैं इस विषय पर चर्चा करूँगा। मैं मुख्यमंत्रियों को भी पत्र लिख रहा हूँ।
यदि NCCF या NAFED को खरीद करनी है, तो उन्हें आवश्यक सुविधाएँ समय पर मिलनी चाहिए। यदि मंडी शुल्क देना है, तो वह समय पर दिया जाए। यदि राज्य की मशीनरी का सहयोग आवश्यक है, तो वह भी समय पर उपलब्ध कराया जाए, ताकि किसानों से समय पर खरीद हो सके।
विशेषकर दलहन और तिलहन के मामले में यदि खरीद सुनिश्चित नहीं होगी, तो किसानों को उत्पादन के लिए प्रोत्साहित करना आसान नहीं होगा।
हमें बाजार की पूरी व्यवस्था की योजना बनानी होगी। प्रोसेसिंग की व्यवस्था, उत्पादन की गुणवत्ता और जहाँ संभव हो वहाँ निर्यात योग्य गुणवत्ता का उत्पादन कैसे हो, इस पर भी ध्यान देना होगा।
मेरा मानना है कि इसके लिए हमें नियमित निगरानी की व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। हमने प्रयास किया है कि हर सप्ताह फसलों की स्थिति का सर्वे किया जाए।
फसल की स्थिति क्या है, बाजार में क्या भाव चल रहे हैं, बीमारी या कीटों का प्रकोप तो नहीं है, इन सभी बातों की जानकारी हमें रियल टाइम में मिलनी चाहिए।
हर सप्ताह फसल की निगरानी आवश्यक है। अंकुरण कितना हुआ है, फसल किस गति से बढ़ रही है, कहीं बीमारी का प्रकोप तो नहीं है और किसानों को किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, इन सबकी जानकारी होनी चाहिए।
कम से कम प्रत्येक सप्ताह कृषि विभाग को यह पता होना चाहिए कि आज राज्य में फसलों की वास्तविक स्थिति क्या है। इसके लिए हम तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह कोई कठिन काम नहीं है।
मैं अपनी बात को कुछ और महत्वपूर्ण बिंदुओं के साथ समाप्त करना चाहता हूँ।
हमें बीज के वितरण से लेकर किसानों तक उसकी उचित और समय पर उपलब्धता तक पूरी व्यवस्था को मजबूत करना होगा। जैसा कि आप जानते हैं, बीज जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण उसका समय पर उपलब्ध होना भी है।
यदि हम समय पर फसल लेना चाहते हैं तो किसान को समय पर बीज मिलना चाहिए। इसके साथ ही राज्य स्तर पर वितरण की ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिससे किसान को बिना किसी परेशानी के बीज उपलब्ध हो सके।
हमने प्रत्येक राज्य के दो जिलों में इसका पायलट भी किया है। किसान आईडी के आधार पर बीज सीधे किसान तक पहुँचे और किसी गलत माध्यम के कारण उसकी गुणवत्ता प्रभावित न हो, यह सुनिश्चित करना होगा।
लगभग हर राज्य से यह शिकायत आती है कि बाजार में बीज काला पड़ गया। जब बाजार में बीज खराब स्थिति में पहुँच रहा है, तो इसका मतलब है कि वितरण व्यवस्था में कहीं न कहीं समस्या है।
इसलिए हमें बीज को सही समय पर उठाना होगा और सही समय पर वितरित करना होगा। अन्यथा रिकॉर्ड देखने पर हमें पता चलता है कि किसी राज्य में बहुत अधिक बीज खराब हो गया।
हमें यह भी देखना होगा कि क्या इतनी मात्रा में बीज हर जिले में खराब हो रहा है या नहीं, हर सोसायटी में इतनी मात्रा में नुकसान हो रहा है या नहीं।
मैं केवल आपको यह याद दिलाना चाहता हूँ कि यह बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इसके लिए उचित व्यवस्था करनी होगी।
हमारी एक और जिम्मेदारी है कि उर्वरकों का संतुलित उपयोग सुनिश्चित किया जाए।
देश हर वर्ष उर्वरकों पर लगभग 2 लाख करोड़ रुपये खर्च करता है। जब उर्वरक की कमी होती है और देश को संकट का सामना करना पड़ता है, तब उसकी कीमत और दबाव दोनों बढ़ते हैं। इसलिए उर्वरकों का संतुलित उपयोग आवश्यक है।
यह किसानों के लिए भारत सरकार की एक बड़ी जिम्मेदारी है, लेकिन यह राज्यों की भी जिम्मेदारी है।
यदि किसी फसल के लिए एक बोरी उर्वरक पर्याप्त है, तो दो बोरी क्यों? हमें उर्वरकों का संतुलित उपयोग क्यों नहीं करना चाहिए? इस बात को ध्यान में रखना आवश्यक है।
हमने खरीफ फसल के दौरान 'खेत बचाओ' अभियान चलाया है। इसे रबी की फसल में भी चलाया जा सकता है। '
खेत बचाओ' का अर्थ है उर्वरकों का संतुलित उपयोग। इसमें हम आपको पूरा सहयोग देंगे। यदि आप कहेंगे कि वैज्ञानिकों को भेजना है, तो हम वैज्ञानिकों को भेजने के लिए तैयार हैं। रबी के लिए भी 'खेत बचाओ' अभियान भी चलाया जाना चाहिए।
हमें मिट्टी को बचाना है, सूक्ष्म जीवों और मिट्टी की जैविक गुणवत्ता को बचाना है। आने वाली पीढ़ियों के लिए मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना हमारी जिम्मेदारी है।
इसलिए उर्वरकों का संतुलित उपयोग करने का प्रयास करें।
मैं दक्षिणी राज्यों को विशेष रूप से बधाई देना चाहता हूँ। 'खेत बचाओ' अभियान के बाद इन राज्यों ने रासायनिक उर्वरकों के उपयोग को कम करने के लिए गंभीर प्रयास किए हैं।
मेरा मानना है कि हर राज्य को इससे सीख लेनी चाहिए। कर्नाटक ने भी एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत किया है। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, तेलंगाना, केरल और पुडुचेरी में पिछले वर्ष की तुलना में यूरिया और DAP की बिक्री कम हुई है।
इन राज्यों के अच्छे अनुभवों को दूसरे राज्यों के साथ साझा किया जाना चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण अवसर प्राकृतिक खेती का है। रबी में हमने इसके लिए क्लस्टर बनाए हैं। किसान तैयार हैं और पंजीकरण भी हुआ है। अब हमें इस दिशा में विशेष ध्यान और निरंतर प्रयास करने की आवश्यकता है।
ब्रांडिंग और मार्केटिंग में सहयोग करना हमारी जिम्मेदारी है, ताकि प्रमाणन की प्रक्रिया किसानों के लिए बाधा न बने।
एक और बात मैं किसान क्रेडिट कार्ड के बारे में कहना चाहता हूँ।
प्रधानमंत्री जी ने लगभग 9.54 करोड़ किसानों को किसान क्रेडिट कार्ड उपलब्ध कराया है। लेकिन अभी भी कई राज्यों में किसान क्रेडिट कार्ड की संख्या अपेक्षाकृत कम है।
अच्छी और समय पर खेती के लिए किसान को पूंजी की आवश्यकता होती है और इसके लिए किसान क्रेडिट कार्ड महत्वपूर्ण साधन है।
इसलिए जिन राज्यों में किसान क्रेडिट कार्ड की संख्या कम है, उन्हें इस दिशा में विशेष अभियान चलाना चाहिए।
विशेषकर पूर्वी भारत के राज्यों, जैसे झारखंड, ओडिशा, बिहार और पश्चिम बंगाल में हमें इस दिशा में और ध्यान देने की आवश्यकता है। इन राज्यों में कृषि ऋण और किसान क्रेडिट कार्ड की पहुँच अपेक्षाकृत कम दिखाई देती है।
मैं यह नहीं कह रहा कि किसानों को जबरन ऋण दिया जाए।
लेकिन यदि किसान को समय पर कृषि में निवेश करना है, तो उसके पास आवश्यक पूंजी होनी चाहिए। हमें यह देखना होगा कि किसान को समय पर कृषि निवेश के लिए धन कैसे उपलब्ध कराया जाए।
विशेष रूप से ऐसे किसान जिनके पास किसान क्रेडिट कार्ड नहीं है और छोटे तथा वंचित वर्ग के किसान, उन्हें भी इस व्यवस्था से जोड़ने का प्रयास करना होगा।
फार्मर आईडी के काम में राज्यों ने बहुत अच्छा कार्य किया है। इसके लिए मैं सभी को बधाई देता हूँ।
पिछले कुछ दिनों में हमने अलग-अलग राज्यों की स्थिति पर चर्चा की है। यदि हम लैंड पार्सल से संबंधित काम पूरा कर लेते हैं, तो किसानों की अनेक समस्याओं का समाधान किया जा सकता है।
जब हम फार्मर आईडी की बात करते हैं, तो हमें पट्टेदार किसानों को नहीं भूलना चाहिए। जो किसान पट्टे पर जमीन लेकर खेती करते हैं या अलग-अलग स्थानों पर खेती करते हैं,
उन्हें भी इस व्यवस्था से जोड़ने के लिए हमें मिलकर काम करना होगा।
आपने तीन प्रमुख विषयों के बारे में विस्तार से चर्चा की है।
अब हमें इन तीनों विषयों पर अलग-अलग समूहों में गंभीरता से विचार करना होगा। मैंने थोड़ा अधिक समय लिया है, लेकिन कुछ महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान केंद्रित करना आवश्यक था, ताकि हम इन्हें मिलकर आगे बढ़ा सकें।
मेरे मित्रों, राष्ट्र के लिए खेती से बड़ा कोई विषय नहीं है। हमें केवल 140 करोड़ भारतीयों का पेट नहीं भरना है,
बल्कि उन्हें पौष्टिक और गुणवत्तापूर्ण अनाज भी उपलब्ध कराना है।
हमारे किसानों की आय बढ़ाने के लिए हमें कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ाना होगा और दुनिया के बाजारों में नए अवसर तलाशने होंगे।
आज हमारे सामने अनेक अवसर हैं। हमें एकीकृत खेती जैसे उपायों पर भी ध्यान देना चाहिए, ताकि छोटे किसानों की आय में वृद्धि हो सके।
मैं इन चर्चाओं में उपस्थित रहूँगा और इसमें सहभागी बनूँगा। मुझे विश्वास है कि कल जब हम यहाँ से जाएंगे, तब कृषि मंत्रालय की टीम भी आपकी चर्चाओं में पूरी तरह सहभागी होगी और आगे की प्रस्तुति आपकी चर्चा के आधार पर तैयार होगी।
जब हम कल यहाँ से निकलें, तो हमारे साथ यह विश्वास और संकल्प होना चाहिए कि हम अपने किसानों और अपनी कृषि को सभी चुनौतियों से आगे ले जाएंगे।
मुझे विश्वास है कि प्रत्येक राज्य में जो टीम और नेतृत्व मौजूद है, वह इस दिशा में पूरी क्षमता से काम करेगा।
मैंने कहा है कि मैं जानना चाहता हूँ कि प्रत्येक राज्य से कौन-कौन यहाँ आया है। यदि किसी राज्य की भागीदारी में कमी होगी, तो मैं संबंधित मुख्यमंत्री से भी बात करूँगा, क्योंकि यही वह टीम है जो जमीन पर निर्णयों को लागू करती है।
हम दो दिन साथ बैठेंगे, चर्चा करेंगे और इस चर्चा से निकलने वाले परिणामों को हमारे किसानों तक पहुँचाएँगे।








