Speech Transcript
ऐतिहासिक शहर हैदराबाद में साउथ की इस रीजनल कॉन्फ्रेंस में मैं आप सबका हृदय से स्वागत करता हूं। मैं तेलंगाना सरकार, मुख्यमंत्री जी और कृषि मंत्री जी का विशेष रूप से आभार प्रकट करता हूं। उन्होंने पूरे मन से इस एग्रीकल्चर कॉन्फ्रेंस की व्यवस्थाएं की हैं।
मित्रों, कल भारत के प्रधानमंत्री, देश के प्रिय नेता, माननीय नरेंद्र मोदी जी का जन्मदिन था। उनके जन्मदिन पर देशभर में जनता जनार्दन ने आशीर्वाद के दीप जलाए। यह दीपक एक प्रतीक है। दीपक खुद जलकर दूसरों को रोशनी देता है। प्रधानमंत्री जी भी अपने जीवन का एक एक क्षण जनता की सेवा में समर्पित कर देश को नई राह दिखाने का काम कर रहे हैं। इस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से मैं उन्हें एक बार फिर जन्मदिन की शुभकामनाएं देता हूं।
दुनिया कितनी भी प्रगति कर ले, एआई हो, मशीन लर्निंग हो, रोबोटिक्स हो या कोई और तकनीक, इनका उपयोग हो सकता है, लेकिन फल, सब्जी और अनाज खेत ही दे सकते हैं। किसान ही दे सकता है। इसलिए खेती के बिना दुनिया नहीं चल सकती।
मशीन रोटी बना सकती है, लेकिन गेहूं पैदा नहीं कर सकती। अनाज खेत में ही पैदा होगा। इसलिए किसान केवल अन्नदाता नहीं, जीवनदाता है। किसानों की सेवा कृषि मंत्री के रूप में मेरे लिए भगवान की पूजा के समान है।
हमारा देश विविधताओं से भरा है। अलग अलग राज्यों के एग्रो क्लाइमेटिक जोन, संसाधन, जल उपलब्धता और मिट्टी की परिस्थितियां अलग हैं। ऐसे में पूरे देश के लिए एक जगह बैठकर रबी या खरीफ की पूरी योजना बनाना आसान नहीं है।
इसीलिए हमने रबी कॉन्फ्रेंस को एक दिन के बजाय दो दिन का करने का निर्णय लिया, ताकि हर राज्य अपनी समस्याएं और सुझाव सामने रख सके, केंद्र अपनी अपेक्षाएं साझा कर सके और मिलकर एग्रीकल्चर का रोडमैप तैयार किया जा सके।
प्रधानमंत्री जी ने भी रीजनल कॉन्फ्रेंसेस की आवश्यकता पर जोर दिया। जम्मू कश्मीर की परिस्थितियां गुजरात से अलग हैं और नॉर्थ ईस्ट की परिस्थितियां आंध्र या तेलंगाना से। इसी तरह कर्नाटक, पुडुचेरी और केरल की अपनी अलग जरूरतें हैं। इसी सोच के साथ दक्षिण के राज्यों की यह रीजनल कॉन्फ्रेंस आयोजित की जा रही है।
मित्रों, एग्रीकल्चर के हमारे तीन प्रमुख लक्ष्य हैं।
पहला, 140 करोड़ से ज्यादा आबादी की फूड सिक्योरिटी सुनिश्चित करना। आज दुनिया में जिस तरह के संकट सामने आ रहे हैं, उनसे यह और महत्वपूर्ण हो गया है कि भोजन के मामले में हम आत्मनिर्भर रहें।
दूसरा, किसानों की आजीविका सुनिश्चित करना। जो किसान देश के लिए अन्न पैदा करता है, उसकी आय और जीवन स्तर बेहतर हो, इसकी चिंता करनी है।
तीसरा, न्यूट्रिशन सिक्योरिटी। भोजन मिले, लेकिन पोषणयुक्त मिले, यह भी उतना ही जरूरी है।
दक्षिण भारत में हॉर्टिकल्चर की अपार संभावनाएं हैं। मसाले, कॉफी, काजू, कोको और कई दूसरी फसलें यहां होती हैं। इनका उत्पादन बढ़ाने से किसानों की आय के साथ पोषण सुरक्षा को भी मजबूती मिल सकती है।
इन लक्ष्यों को हासिल करने के लिए हमारी रणनीति के छह प्रमुख सूत्र हैं।
पहला, उत्पादन और उत्पादकता दोनों बढ़ाना।
दूसरा, उत्पादन की लागत कम करना, ताकि किसान का लाभ बढ़े।
तीसरा, किसान को उसके उत्पादन का बेहतर दाम मिले। इसके लिए एमएसपी और एमएसपी पर खरीद की व्यवस्था है।
चौथा, प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान की भरपाई करना। दक्षिण के राज्यों में अलनीनो का प्रभाव भी एक चुनौती है। ऐसी परिस्थितियों में फसल बीमा और प्रधानमंत्री फसल बीमा जैसी योजनाएं महत्वपूर्ण हैं।
पांचवां, एग्रीकल्चर में डायवर्सिफिकेशन। जिन चीजों के लिए हम आयात पर निर्भर हैं, उनके उत्पादन को बढ़ावा देना होगा। ऑयल सीड्स इसका एक उदाहरण है। तेलंगाना और आंध्र ने पाम ऑयल के क्षेत्र में अच्छा काम किया है। डायवर्सिफिकेशन से किसान की आय बढ़ाने के साथ सॉयल हेल्थ को भी बेहतर रखा जा सकता है।
छठा, हमारी धरती आने वाली पीढ़ियों की भी है। इसलिए सॉयल हेल्थ को बनाए रखना और नेचुरल फार्मिंग जैसे उपायों को आगे बढ़ाना जरूरी है।
इन सबकी शुरुआत बीज से होती है। हमारे वैज्ञानिकों ने लगभग 4000 अलग अलग फसलों की उन्नत किस्में विकसित की हैं, लेकिन अच्छे बीज समय पर किसान तक पहुंचना भी उतना
मैं राज्यों से आग्रह करूंगा कि अपनी बीज की आवश्यकता पहले से तय करें और उसके अनुसार समय पर सर्टिफाइड सीड्स उठाएं, ताकि रबी की तैयारी के दौरान किसानों को अच्छे बीज की कमी न हो।
साथ ही वैज्ञानिकों को भी उत्पादकता और कम अवधि वाली किस्मों पर ध्यान देना होगा। एम.एल. जाट जी यहां बैठे हैं। पल्स मिशन के साथ यह भी देखना होगा कि नौ महीने में तैयार होने वाली तुअर की वैरायटी किसान क्यों बोएगा। आज दो क्रॉप और तीन क्रॉप का समय है। इसलिए इस दिशा में और रिसर्च की जरूरत है।
बीज के साथ सॉयल हेल्थ कार्ड का उपयोग भी सुनिश्चित करना होगा। केवल कार्ड बना देना पर्याप्त नहीं है। किसान उसमें दी गई जानकारी के आधार पर जमीन में जिन तत्वों की कमी है, उसके अनुसार फर्टिलाइजर का उपयोग करे, यह भी देखना होगा।
इसी तरह घटिया सीड्स और पेस्टिसाइड से किसानों को बचाना जरूरी है। कई जगह ऐसी शिकायतें आती हैं। हम सीड एक्ट और पेस्टिसाइड एक्ट में बदलाव पर काम कर रहे हैं। नए कानून आने तक पुराने कानूनों को भी प्रभावी ढंग से लागू करना होगा।
खरीद के मामले में पैडी और व्हीट में मुख्य रूप से दिक्कत नहीं आती, लेकिन पल्सेस में स्थिति अलग है।
अरहर, मसूर और उड़द जैसी दालों की भारत सरकार 100 प्रतिशत खरीद करेगी। किसान रजिस्टर करवाए, एक एक दाना खरीदने की व्यवस्था है। बाकी में पीएम आशा के तहत कुल उत्पादन का 25 प्रतिशत खरीदा जाता है और जरूरत के अनुसार राज्यों का कोटा बढ़ाया जा सकता है।
लेकिन कई बार राज्यों को जितनी खरीद की अनुमति मिलती है, उतनी खरीद भी नहीं हो पाती। अगर खरीद प्रभावी नहीं होगी तो किसान पल्सेस की ओर नहीं जाएगा। इसलिए पीएम आशा का बेहतर उपयोग करना जरूरी है।
किसान भाइयों को एक उदाहरण देना चाहता हूं। पिछली बार आंध्र और कर्नाटक में तोतापुरी आम के रेट काफी नीचे चले गए थे। उस समय एमआईएस स्कीम के तहत तोतापुरी आम खरीदने की अनुमति दी गई। इसमें 50 प्रतिशत घाटा राज्य और 50 प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करती है।
इसके बाद हमने टीम भेजी और यह देखा कि केवल तोतापुरी पर निर्भर रहने के बजाय उसी पेड़ में दूसरी वैरायटी विकसित की जा सकती है। वैज्ञानिकों ने प्रूनिंग के माध्यम से इस पर काम किया। आज टेक्नोलॉजी उपलब्ध है। हमें ऐसी वैरायटी विकसित करने की दिशा में काम करना चाहिए, जिसकी कीमत भी बेहतर मिले।
इसी तरह कई योजनाओं का जरूरत के समय प्रभावी उपयोग किया जा सकता है। अगर टमाटर, आलू या प्याज एक जगह सस्ता है और दूसरी जगह महंगा, तो किसान के लिए खुद उसे दूसरी जगह ले जाना मुश्किल होता है।
कोकोनट के मामले में भी काफी संभावनाएं हैं। एक साल में हमारा एक्सपोर्ट 4349 करोड़ से बढ़कर 70038 करोड़ हो गया है। इसमें 62 प्रतिशत की ग्रोथ हुई है।
कोकोनट प्रमोशन के लिए नई योजना बनी है, जिसका बजट में ऐलान हुआ है। दक्षिण के राज्य कोकोनट के क्षेत्र में देश को लीड करते हैं। इसलिए पुराने बागों के जीर्णोद्धार पर अभी से काम करना चाहिए।
60 से 70 साल पुराने नारियल के पेड़ों में उत्पादन और क्वालिटी कम हो जाती है। इसलिए उनकी जगह नए पेड़ धीरे धीरे और चरणबद्ध तरीके से लगाने की योजना बनानी होगी। काजू और कोको के प्रमोशन के लिए बनी योजनाओं पर भी समय रहते काम करना चाहिए।
एक और महत्वपूर्ण विषय केसीसी है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का लाभ लगभग 10 करोड़ किसानों को मिल रहा है। पिछली बार लगभग 9 करोड़ 54 लाख किसानों को इसका लाभ दिया गया था, लेकिन केसीसी की संख्या इसके मुकाबले लगभग आधी है।
जितने किसानों को प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि का लाभ मिल रहा है, कम से कम उतने किसानों के केसीसी बनाए जाएं, ताकि उन्हें सस्ता लोन मिल सके। इसके लिए अभियान चलाने की जरूरत है।
फार्मर आईडी के क्षेत्र में दक्षिण के कई राज्यों ने अच्छा काम किया है। तेलंगाना और आंध्र ने भी प्रगति की है। अब इसे पूरी तरह सैचुरेट करने की दिशा में काम करना होगा। जमीन के लैंड पार्सल से संबंधित काम भी समय पर पूरा होना चाहिए। डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन की प्रेजेंटेशन में इस पर चर्चा होगी।
हर राज्य को अपना एग्रीकल्चर रोडमैप भी बनाना चाहिए। भारत सरकार के दक्षिण भारत में अलग अलग एग्रीकल्चर इंस्टीट्यूट हैं। आईसीएआर और हमारे केवीके राज्यों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार हैं।
एग्रो क्लाइमेटिक कंडीशंस के अनुसार आज की परिस्थितियों में खेती कैसी होनी चाहिए, इसका वैज्ञानिक रोडमैप मिलकर तैयार करना होगा, ताकि किसानों को बेहतर परिणाम मिल सकें।
प्रधानमंत्री जी का रिफॉर्म्स पर काफी जोर है। हमें देखना होगा कि कौन से नियम, कानून और प्रक्रियाएं ऐसी हैं, जिनमें बदलाव की जरूरत है। नियम जनता के लिए हैं, जनता नियम के लिए नहीं।
अगर पुराने एक्ट या प्रक्रियाओं में बदलाव की जरूरत है तो उन्हें बदला जाना चाहिए, चाहे वे भारत सरकार के हों या राज्य सरकारों के। भारत सरकार के स्तर पर कोई समस्या हो तो आप खुलकर बताइए। राज्य के स्तर पर बदलाव की जरूरत हो तो वहां भी पहल होनी चाहिए।
प्रधानमंत्री जी ने कहा है कि सरकार फाइल में नहीं, जनता की लाइफ में दिखनी चाहिए। इसलिए जहां नियमों में बदलाव की जरूरत है, वहां सुझाव दीजिए और मिलकर समाधान निकालिए।
आज इस कॉन्फ्रेंस में अलग अलग विषयों पर प्रेजेंटेशन होंगे और उन पर चर्चा होगी। किसान और दूसरे स्टेकहोल्डर्स अपने सुझाव देंगे। अलग अलग राज्यों की बेस्ट प्रैक्टिस भी साझा की जाएगी, ताकि एक राज्य दूसरे राज्य से सीख सके।
दक्षिण के राज्यों ने एग्रीकल्चर और हॉर्टिकल्चर में अच्छा काम किया है। इसके लिए मैं आप सभी को बधाई देता हूं। आगे भी नई संभावनाओं पर मिलकर काम करना है।
भारत सरकार राज्यों को पूरा सहयोग करेगी। जमीन राज्य के पास है और किसान राज्य में है। कौन सी सरकार है, इससे फर्क नहीं पड़ता। डेमोक्रेसी में जनता की चुनी हुई सरकार ही हमारी सरकार है। देश पहले है, नेशन फर्स्ट। इसलिए केंद्र और राज्य को मिलकर काम करना चाहिए।
अलनीनो के प्रभाव को देखते हुए हमने जिलों के हिसाब से कंटिजेंसी प्लान बनाए हैं। एक ही राज्य के भीतर भी परिस्थितियां अलग होती हैं। कहीं बारिश का डेफिसिट ज्यादा है, कहीं कम है और कहीं सामान्य है।
अगर रबी की फसल में बदलाव की जरूरत हो, पानी कम हो या अंडरग्राउंड वाटर नीचे चला गया हो तो कम पानी में होने वाली फसलों और उनके बीजों पर जोर दिया जाएगा। इसके लिए हमारे पास सीड बैंक भी तैयार है। राज्यों को इससे किस तरह मदद दी जा सकती है, इस पर मिलकर काम करेंगे।
जहां बारिश अच्छी हुई है, वहां अलनीनो का असर कम है। जहां प्रभाव है, वहां परिस्थितियों के अनुसार आगे की रणनीति तय की जाएगी।
यह कॉन्फ्रेंस केवल चर्चा के लिए नहीं है। इसका उद्देश्य किसान की आय और जीवन में सुधार, देश की फूड सिक्योरिटी, रोजगार के अवसर और कृषि के माध्यम से अर्थव्यवस्था को गति देना है।
मित्रों, प्रधानमंत्री जी के नेतृत्व में दुनिया के कई देशों के साथ एफटीए हुए हैं। इससे हमारे लिए कई अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अवसर बढ़े हैं। हमें इन बाजारों की मांग को समझना होगा और उसी के अनुसार फल, सब्जियों और अनाज की गुणवत्ता तथा उत्पादन की योजना बनानी होगी। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार उत्पादन सुनिश्चित करना भी जरूरी है।
दुनिया के बाजार हमारे लिए खुल रहे हैं। इसलिए आइए, इन अवसरों का लाभ उठाने और खेती से जुड़े विषयों पर ठोस काम करने के लिए मिलकर आगे बढ़ें।








